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लिम्फ़ और रोग-प्रतिरोधक शक्ति

आपके शरीर में ख़ून के अलावा एक दूसरी नदी भी बहती है। इसे लिम्फ़ (लसीका) कहते हैं, और इसका कोई पंप नहीं है — यह तभी चलती है जब आपकी मांसपेशियाँ हिलती हैं और छाती साँस लेती है। घर लौटते हुए यह सैकड़ों छोटे छन्ना-स्टेशनों, यानी लिम्फ़ ग्रंथियों, से गुज़रती है, जहाँ आपकी रक्षक कोशिकाएँ इसमें कीटाणु ढूँढती हैं।

परिचय

लिम्फ़ैटिक सिस्टम (लसीका तंत्र) क्या है?

लिम्फ़ैटिक सिस्टम पतली नलियों (लिम्फ़ नलियाँ), सेम के दाने जैसी छोटी छन्नियों (लिम्फ़ ग्रंथियाँ) और कुछ अंगों — तिल्ली, थाइमस, टॉन्सिल और हड्डियों की मज्जा (बोन मैरो) — का जाल है। यह ऊतकों से फ़ालतू तरल निकालकर वापस ख़ून में पहुँचाता है, और आपकी रोग-प्रतिरोधक व्यवस्था का बड़ा हिस्सा इसी में रहता है।

आपकी रोग-प्रतिरोधक व्यवस्था (इम्यून सिस्टम) शरीर की रक्षा-सेना है। इसके सिपाही सफ़ेद रक्त कोशिकाएँ हैं — सबसे ज़्यादा लिम्फ़ोसाइट (T कोशिकाएँ और B कोशिकाएँ) — और उनकी बनाई एंटीबॉडी। ये कोशिकाएँ बोन मैरो में पैदा होती हैं, इनमें से बहुत-सी थाइमस में प्रशिक्षित होती हैं, और लिम्फ़ के रास्तों पर घूमती और इकट्ठा होती हैं।

न्यूरोथेरेपी (LMNT) की अपनी परिभाषा में एक नहीं, दो तरल हैं: इसका लक्ष्य अंगों में ख़ून और लिम्फ़, दोनों का बहाव सुधारना है। ख़ून को धकेलने के लिए दिल है। लिम्फ़ के पास सिर्फ़ हरकत, साँस और शरीर की मुद्रा है — इसीलिए बिस्तर पर पड़े या दिन भर बैठे रहने वाले लोगों में सूजन और बार-बार इन्फ़ेक्शन ज़्यादा होते हैं।

लिम्फ़ैटिक सिस्टम: पतली नलियों का जाल, सैकड़ों छन्ना-स्टेशन (ग्रंथियाँ), और वे अंग जहाँ रक्षक कोशिकाएँ बनती, प्रशिक्षित होती और जमा रहती हैं।

काम

लिम्फ़ैटिक सिस्टम क्या काम करता है?

ख़ून आपकी कोशिकाओं को सीधे नहीं छूता। सबसे बारीक रक्त-नलियों से एक साफ़, पानी जैसा तरल रिसकर बाहर आता है और कोशिकाओं को नहलाता है। इसका ज़्यादातर हिस्सा वापस ख़ून में चला जाता है, पर कुछ पीछे रह जाता है। लिम्फ़ैटिक सिस्टम इसी बचे हुए तरल को इकट्ठा करता है, रास्ते में साफ़ करता है और गर्दन के निचले हिस्से के पास वापस ख़ून में मिला देता है। यही रास्ते शरीर की रक्षक कोशिकाओं को भी ढोते हैं।

  • ऊतकों का फ़ालतू तरल — रोज़ लगभग 2 से 3 लीटर — निकालकर वापस ख़ून में पहुँचाता है, ताकि ऊतक सूजें नहीं।
  • छोटी आँत से सोखी गई चर्बी को ख़ास लिम्फ़ नलियों — लैक्टियल — के ज़रिए ख़ून तक ले जाता है।
  • ग्रंथियों में लिम्फ़ को छानता है और कीटाणु, मरी हुई कोशिकाएँ और बिगड़ी या असामान्य कोशिकाएँ रोक लेता है।
  • इन्फ़ेक्शन से लड़ने वाली सफ़ेद कोशिकाएँ बनाता, प्रशिक्षित करता और जमा रखता है — बोन मैरो, थाइमस, तिल्ली और ग्रंथियों में।
  • एंटीबॉडी बनाता है — ऐसे प्रोटीन जो किसी ख़ास कीटाणु से चिपक जाते हैं — और पहले मिल चुके कीटाणुओं की याद रखता है।
  1. तरल रिसकर बाहर आता है

    सबसे बारीक रक्त-नलियों (केशिकाओं) से पानी जैसा तरल कोशिकाओं के बीच की जगहों में रिसता है और उन्हें भोजन और ऑक्सीजन पहुँचाता है।

  2. बारीक लिम्फ़ नलियाँ उसे समेटती हैं

    कोशिकाओं के बीच बंद सिरे वाली लिम्फ़ केशिकाएँ होती हैं। इनकी दीवारों के किनारे एक-दूसरे पर चढ़े रहते हैं और फाटक की तरह खुलकर तरल को अंदर आने देते हैं, बाहर नहीं। अब इस तरल को लिम्फ़ कहते हैं।

  3. दबकर आगे बढ़ता है

    बड़ी लिम्फ़ नलियों में एक-तरफ़ा वाल्व होते हैं। जब भी कोई मांसपेशी कसती है, छाती साँस लेती है या पास की धमनी धड़कती है, लिम्फ़ एक क़दम आगे दबती है — कभी पीछे नहीं।

  4. ग्रंथियों पर जाँच

    रास्ते में लिम्फ़ कई ग्रंथियों से गुज़रती है। यहाँ सफ़ेद कोशिकाएँ उसकी जाँच करती हैं, कीटाणु और कचरा खा जाती हैं, और कुछ पराया मिलने पर बचाव शुरू कर देती हैं।

  5. ख़ून में वापसी

    लिम्फ़ दो मुख्य नलिकाओं में इकट्ठा होकर गर्दन के निचले हिस्से में बड़ी शिराओं में ख़ाली हो जाती है। बाईं ओर की बड़ी नलिका शरीर की लगभग तीन-चौथाई लिम्फ़ ले जाती है।

लिम्फ़ैटिक सिस्टम दूसरे तंत्रों के साथ कैसे काम करता है?

  • हृदय, ख़ून और रक्त-संचार — लिम्फ़ ख़ून से रिसे तरल के रूप में शुरू होती है और वापस ख़ून में मिलकर ख़त्म होती है। इसके बिना ख़ून का तरल और प्रोटीन धीरे-धीरे ऊतकों में खो जाता।
  • पाचन तंत्र — खाने की चर्बी आँतों की लिम्फ़ नलियों से होकर जाती है। आँत की दीवार में भी बहुत-सा रक्षक ऊतक होता है, जो उस लंबी सतह की रखवाली करता है जहाँ भोजन शरीर से मिलता है।
  • फेफड़े और साँस — हर साँस डायाफ़्राम को हिलाती है, जो छाती में लिम्फ़ को ऊपर पंप करने में मदद करता है। टॉन्सिल और साँस की नलियों के आसपास की ग्रंथियाँ साँस के साथ आने वाले कीटाणुओं के दरवाज़े पर पहरा देती हैं।
  • मांसपेशी तंत्र — काम करती मांसपेशियाँ लिम्फ़ का मुख्य पंप हैं — ख़ासकर चलते समय पिंडली की मांसपेशियाँ।
  • त्वचा (चमड़ी) — बिना कटी त्वचा कीटाणुओं के ख़िलाफ़ पहली दीवार है। त्वचा कटने पर सबसे पास की लिम्फ़ ग्रंथियाँ — जाँघ के जोड़, बगल या गर्दन में — बचाव की अगली पंक्ति बनती हैं।
  • ग्रंथियाँ और हॉर्मोन (एंडोक्राइन तंत्र) — थाइमस एक ग्रंथि भी है और रोग-प्रतिरोधक अंग भी। एड्रिनल ग्रंथियों से निकलने वाले कॉर्टिसोल जैसे तनाव-हॉर्मोन रोग-प्रतिरोधक प्रतिक्रिया को धीमा कर सकते हैं।
  • ख़ून (रक्त) — सफ़ेद रक्त कोशिकाएँ — रोग-प्रतिरोधक सेना के सिपाही — दोनों नदियों, ख़ून और लिम्फ़, में सफ़र करती हैं।

बनावट

टीम से मिलिए

लिम्फ़ ग्रंथियाँ (गिल्टियाँ)

जाँच-चौकियाँ। सैकड़ों छोटी छन्नियाँ, जहाँ लिम्फ़ की जाँच होती है और बचाव की तैयारी होती है।

तिल्ली (स्प्लीन)

ख़ून की छन्नी। सबसे बड़ा लिम्फ़ वाला अंग; यह ख़ून साफ़ करता है और सफ़ेद कोशिकाएँ जमा रखता है। LMNT में Spl पॉइंट को सफ़ेद कोशिकाएँ और एंटीबॉडी बनाने वाला बताया गया है।

थाइमस ग्रंथि

प्रशिक्षण-स्कूल। T कोशिकाएँ यहाँ कीटाणुओं पर हमला करना और शरीर की अपनी कोशिकाओं को बख़्शना सीखती हैं। LMNT में Thymus रोग-प्रतिरोधक शक्ति के छह पॉइंट्स में से एक है।

ख़ून (रक्त)

सिपाहियों की जन्मभूमि और सड़क। सफ़ेद कोशिकाएँ बोन मैरो में पैदा होती हैं और लिम्फ़ के साथ-साथ ख़ून में भी चलती हैं।

आँतें

सबसे बड़ी सीमा-चौकी। आँत की दीवार में लिम्फ़ के पैच हैं, जो भोजन वाली सतह की रखवाली करते हैं, और लैक्टियल हैं, जो चर्बी को आगे ले जाते हैं।

लिम्फ़ैटिक सिस्टम के कौन-कौन से हिस्से हैं?

इस तंत्र के चार तरह के हिस्से हैं: ख़ुद तरल, उसे ढोने वाली नलियाँ, उसे छानने वाली ग्रंथियाँ, और वे अंग जहाँ रक्षक कोशिकाएँ बनती और प्रशिक्षित होती हैं।

लिम्फ़ और उसकी नलियाँ

एक-तरफ़ा निकासी का जाल — बंद सिरे वाली बारीक नलियों से लेकर दो बड़ी नलिकाओं तक।

  • लिम्फ़ (लसीका) — ख़ून के प्लाज़्मा से बना साफ़, हल्का पीलापन लिए तरल। इसमें प्रोटीन, चर्बी, सफ़ेद कोशिकाएँ और कचरा होता है, पर लाल कोशिकाएँ नहीं।
  • लिम्फ़ केशिकाएँ — कोशिकाओं के बीच सबसे बारीक, बंद सिरे वाली नलियाँ, जिनके फाटक जैसे किनारे तरल को अंदर आने देते हैं।
  • लिम्फ़ नलियाँ — पतली दीवार वाली नलियाँ, जिनमें बहुत-से एक-तरफ़ा वाल्व होते हैं, जिनसे ये मोतियों की माला जैसी दिखती हैं। ये आम तौर पर शिराओं के साथ-साथ चलती हैं।
  • लैक्टियल — छोटी आँत की उँगली जैसी विलाई के अंदर की ख़ास लिम्फ़ नलियाँ, जो पची हुई चर्बी सोखती हैं।
  • थोरैसिक डक्ट — शरीर की सबसे बड़ी लिम्फ़ नली। यह रीढ़ के आगे ऊपर चढ़ती है और गर्दन के निचले हिस्से में बाईं ओर की शिराओं में ख़ाली होती है; यह दोनों टाँगों, पेट और शरीर के बाएँ ऊपरी हिस्से की लिम्फ़ लाती है।
  • दाईं लिम्फ़ैटिक डक्ट — एक छोटी नलिका, जो सिर्फ़ दाईं बाँह और सिर, गर्दन व छाती के दाएँ हिस्से की लिम्फ़ दाईं ओर की शिराओं में डालती है।
रिसाव से छन्नी तक: तरल ख़ून से निकलता है, एक-तरफ़ा फाटकों से लिम्फ़ केशिकाओं में आता है, और वाल्वों से होता हुआ लिम्फ़ ग्रंथि तक पहुँचता है।

लिम्फ़ ग्रंथियाँ

कई सौ छोटी छन्नियाँ, जो क़तारों और गुच्छों में होती हैं।

  • गर्दन की ग्रंथियाँ — सिर, चेहरे, मुँह और गले की लिम्फ़ छानती हैं — गला ख़राब होने पर यही 'गिल्टियाँ' सूजती हैं।
  • बगल की ग्रंथियाँ — बाँह, छाती की दीवार और स्तन की लिम्फ़ छानती हैं।
  • जाँघ के जोड़ की ग्रंथियाँ — जाँघ के जोड़ की सिलवट के ठीक नीचे; ये पूरी टाँग और पैर, कूल्हे और पेट की निचली दीवार की लिम्फ़ छानती हैं।
  • गहरी ग्रंथियाँ — छाती और पेट के अंदर, साँस की नलियों, आँतों और बड़ी रक्त-नलियों के साथ। ये बाहर से महसूस नहीं होतीं।

लिम्फ़ से जुड़े अंग

जहाँ रक्षक कोशिकाएँ बनती, प्रशिक्षित होतीं, जमा रहतीं और काम पर लगती हैं।

  • बोन मैरो (अस्थि-मज्जा) — हड्डियों का नरम अंदरूनी हिस्सा, जहाँ हर सफ़ेद कोशिका समेत ख़ून की सारी कोशिकाएँ पैदा होती हैं। B कोशिकाएँ भी यहीं परिपक्व होती हैं।
  • थाइमस — सीने की हड्डी के पीछे की ग्रंथि, जहाँ T कोशिकाओं को कीटाणुओं पर हमला करना और शरीर की अपनी कोशिकाओं को छोड़ देना सिखाया जाता है। बचपन में यह सबसे बड़ी होती है।
  • तिल्ली (स्प्लीन) — सबसे बड़ा लिम्फ़ वाला अंग, पेट के ऊपरी बाएँ हिस्से में। यह ख़ुद ख़ून को छानती है, पुरानी लाल कोशिकाएँ हटाती है और सफ़ेद कोशिकाएँ जमा रखती है।
  • टॉन्सिल और एडिनॉइड — मुँह और नाक के पिछले हिस्से में लिम्फ़ ऊतक के टुकड़े, जो खाने और हवा के दरवाज़े पर पहरा देते हैं।
  • आँत के पैच (पेयर्स पैच) और अपेंडिक्स — आँत की दीवार में रक्षक ऊतक के समूह, जो गुज़रती चीज़ों के नमूने लेते हैं और हानिकारक कीटाणुओं पर नज़र रखते हैं।

रक्षक कोशिकाएँ

अलग-अलग सफ़ेद कोशिकाओं के अलग-अलग काम हैं, जैसे सेना की अलग-अलग टुकड़ियाँ।

  • B कोशिकाएँ — प्लाज़्मा कोशिकाओं में बदलकर एंटीबॉडी बनाती हैं — ऐसे प्रोटीन जो किसी एक ख़ास कीटाणु पर ताले की तरह फ़िट हो जाते हैं।
  • T कोशिकाएँ — हेल्पर T कोशिकाएँ हमले का निर्देश देती हैं; किलर T कोशिकाएँ वायरस से संक्रमित और कुछ असामान्य कोशिकाओं को नष्ट करती हैं।
  • नैचुरल किलर (NK) कोशिकाएँ — तेज़ी से पहुँचने वाली कोशिकाएँ, जो पहले से सिखाए बिना संक्रमित या असामान्य कोशिकाओं को नष्ट कर देती हैं।
  • मैक्रोफ़ेज और न्यूट्रोफ़िल — 'खाने वाली' कोशिकाएँ, जो कीटाणु निगल जाती हैं और मरी कोशिकाओं व कचरे को साफ़ करती हैं।
  • इओसिनोफ़िल — परजीवियों से लड़ती हैं। ये ऐसे रसायन भी छोड़ती हैं जो साँस की नलियाँ संकरी कर सकते हैं — इसीलिए एलर्जी और अस्थमा में इनकी संख्या बढ़ती है।
रक्षा-सेना: कुछ कोशिकाएँ एंटीबॉडी बनाती हैं, कुछ हमले का निर्देश देती हैं, कुछ संक्रमित कोशिकाओं को मारती हैं, और कुछ बस कीटाणु और कचरा खा जाती हैं।

लिम्फ़ैटिक सिस्टम कहाँ होता है?

लिम्फ़ नलियाँ शिराओं के साथ-साथ चलते हुए शरीर के लगभग हर हिस्से तक पहुँचती हैं। जो ग्रंथियाँ कभी-कभी महसूस होती हैं, वे गर्दन में, जबड़े के नीचे, बगल में और जाँघ के जोड़ में त्वचा के ठीक नीचे होती हैं। इनसे कहीं ज़्यादा ग्रंथियाँ छाती और पेट के अंदर गहराई में होती हैं।

सारी लिम्फ़ गर्दन के निचले हिस्से में घर लौटती है, जहाँ दोनों मुख्य नलिकाएँ हँसली (कॉलरबोन) के ठीक पीछे बड़ी शिराओं में ख़ाली होती हैं। तिल्ली पेट के ऊपरी बाएँ हिस्से में पसलियों के नीचे रहती है; थाइमस सीने की हड्डी के ऊपरी हिस्से के पीछे, दिल के सामने रहता है।

यह निकासी एक तरफ़ झुकी हुई है। बाईं ओर दोनों टाँगों, पेट के सारे अंगों और शरीर के बाएँ ऊपरी हिस्से की लिम्फ़ जाती है; दाईं ओर सिर्फ़ दाईं बाँह और सिर व छाती के दाएँ हिस्से की। LMNT पद्धति इस असमानता को दर्ज करती है और इसकी वजह को एक खुला सवाल मानकर छोड़ती है।

शरीर की लगभग तीन-चौथाई लिम्फ़ बाईं ओर की थोरैसिक डक्ट से लौटती है; सिर्फ़ ऊपरी दायाँ चौथाई हिस्सा दाईं ओर ख़ाली होता है।

इसके पड़ोसी:

लिम्फ़ैटिक सिस्टम दिखता कैसा है?

लिम्फ़ आम तौर पर साफ़ या हल्के भूसे के रंग की होती है, जैसे बहुत हल्की चाय। चर्बी वाले खाने के बाद आँत से आने वाली लिम्फ़ दूधिया सफ़ेद हो जाती है, क्योंकि वह चर्बी की बारीक बूँदों से भरी होती है; इस दूधिया लिम्फ़ को काइल (chyle) कहते हैं।

लिम्फ़ नलियाँ पतली और लगभग पारदर्शी होती हैं, और बहुत-से वाल्वों के कारण मोतियों की लड़ी जैसी दिखती हैं। लिम्फ़ ग्रंथियाँ छोटी, नरम, सेम के दाने जैसी और हल्की गुलाबी-धूसर होती हैं। स्वस्थ ग्रंथि आम तौर पर इतनी छोटी और नरम होती है कि महसूस नहीं होती।

लिम्फ़ैटिक सिस्टम कितना बड़ा होता है?

आपके शरीर में कई सौ लिम्फ़ ग्रंथियाँ हैं — अनुमान लगभग 450 से 700 तक के हैं। ज़्यादातर कुछ मिलीमीटर से लगभग 1 सेमी लंबी होती हैं; लगभग 1 सेमी से बड़ी ग्रंथि आम तौर पर डॉक्टर को दिखाने लायक़ होती है।

थोरैसिक डक्ट लगभग 38–45 सेमी लंबी है, पर सिर्फ़ कुछ मिलीमीटर चौड़ी। तिल्ली लगभग 12 सेमी लंबी और लगभग 150 ग्राम की होती है। रोज़ लगभग 2 से 3 लीटर लिम्फ़ ख़ून में लौटती है — दिल के पंप किए हज़ारों लीटर ख़ून के आगे बहुत थोड़ी।

छोटे आँकड़े, बड़ा काम: ज़्यादातर ग्रंथियाँ 1 सेमी से छोटी, लगभग आधा मीटर लंबी नलिका, और रोज़ 2–3 लीटर लिम्फ़।

रोग और गड़बड़ियाँ

लिम्फ़ और रोग-प्रतिरोधक तंत्र को कौन-सी बीमारियाँ और गड़बड़ियाँ प्रभावित करती हैं?

यहाँ की तकलीफ़ें चार परिवारों में आती हैं: रक्षा बहुत कमज़ोर हो, रक्षा बहुत तेज़ हो या ग़लत निशाने पर हो, निकासी रुक जाए, या रक्षक कोशिकाएँ ख़ुद बेक़ाबू होकर बढ़ने लगें।

जब रक्षा बहुत कमज़ोर हो या हार जाए

  • इन्फ़ेक्शन (संक्रमण)कीटाणु भारी पड़ जाते हैं — अक्सर इस बात का संकेत कि शरीर की लड़ने की ताक़त घट गई है।
  • बुख़ार और वायरल बुख़ारबुख़ार बचाव का ही हिस्सा है: गर्म शरीर में कई कीटाणु धीमे पड़ते हैं और रक्षक कोशिकाएँ तेज़ होती हैं।
  • गला ख़राब और गला बैठनागले में कीटाणुओं से लड़ते हुए टॉन्सिल और गर्दन की ग्रंथियाँ सूज जाती हैं।
  • शिंगल्स (हर्पीज़ ज़ोस्टर, नागिन)चिकनपॉक्स का पुराना वायरस जाग जाता है, अक्सर तब जब उम्र या तनाव से रोग-प्रतिरोधक शक्ति घटती है।
  • HIV/एड्सएक वायरस, जो हेल्पर T कोशिकाओं को नष्ट करके धीरे-धीरे पूरी रक्षा-व्यवस्था को कमज़ोर कर देता है।
  • सेप्टिसीमिया (सेप्सिस)इन्फ़ेक्शन ख़ून में फैल जाता है और शरीर की प्रतिक्रिया बेक़ाबू हो जाती है — यह इमरजेंसी है।

जब रक्षा बहुत तेज़ हो या ग़लत निशाने पर वार करे

  • एलर्जीरक्षा-व्यवस्था पराग, धूल या कुछ खानों जैसी हानिरहित चीज़ों पर ज़रूरत से ज़्यादा भड़क उठती है।
  • अस्थमा (दमा)इओसिनोफ़िल और दूसरी रक्षक कोशिकाएँ साँस की नलियों में सूजन लाकर उन्हें संकरा कर देती हैं।
  • ऑटो-इम्यून बीमारियाँरक्षा-व्यवस्था शरीर के अपने ऊतक को दुश्मन समझकर उस पर हमला कर देती है।
  • रूमेटॉइड आर्थराइटिस (RA) और वात रोगजोड़ों की अंदरूनी परत पर ऑटो-इम्यून हमला।
  • ITP (प्लेटलेट्स की कमी)रक्षा-व्यवस्था शरीर के अपने प्लेटलेट्स नष्ट कर देती है, इसलिए आसानी से नील पड़ते और ख़ून बहता है।
  • सूजन-जलन (इन्फ़्लेमेशन)रक्षा की वह प्रतिक्रिया जो बहुत देर तक या बहुत ज़ोर से चालू रहे, और उसी ऊतक को नुक़सान पहुँचाए जिसकी रक्षा करनी थी।

जब निकासी रुक जाए

जब रक्षक कोशिकाएँ बेक़ाबू होकर बढ़ें

लिम्फ़ या रोग-प्रतिरोधक शक्ति की तकलीफ़ के आम संकेत क्या हैं?

  • गर्दन, बगल या जाँघ के जोड़ में सूजी, दुखती गिल्टियाँ — आम तौर पर पास में किसी इन्फ़ेक्शन के साथ
  • ऐसी गिल्टी जो सख़्त हो, दर्द न करे, एक जगह जमी हो, बढ़ रही हो, या दो-तीन हफ़्ते बाद भी बनी रहे
  • बार-बार लौटने वाले इन्फ़ेक्शन, या धीरे भरने वाले घाव
  • बिना साफ़ वजह के बुख़ार, रात में पसीने से तर होना या वज़न घटना
  • बाँह या टाँग की ऐसी सूजन जो आराम से भी न उतरे
  • किसी कट या घाव से बाँह-टाँग पर ऊपर चढ़ती लाल लकीर — इसके लिए उसी दिन डॉक्टर चाहिए
  • ख़ास चीज़ों के संपर्क में आने पर दाने, छींकें या साँस में सीटी (एलर्जी)

लिम्फ़ और रोग-प्रतिरोधक तंत्र की जाँच कौन-सी जाँचों से होती है?

  • ग्रंथियों की जाँच — डॉक्टर गर्दन, बगल और जाँघ के जोड़ को छूकर ग्रंथियों का आकार, सख़्ती, दर्द और यह देखते हैं कि वे हिलती हैं या नहीं।
  • कम्प्लीट ब्लड काउंट (CBC) और डिफ़रेंशियल — सफ़ेद कोशिकाओं की कुल संख्या और हर प्रकार — लिम्फ़ोसाइट, न्यूट्रोफ़िल, इओसिनोफ़िल आदि — की गिनती करता है।
  • ESR और CRP — ख़ून के ऐसे संकेतक, जो सूजन या इन्फ़ेक्शन में बढ़ते हैं।
  • एंटीबॉडी और इन्फ़ेक्शन की जाँचें — जैसे HIV की जाँच, ख़ास इन्फ़ेक्शन की जाँच, या ऑटो-इम्यून बीमारी में ऑटो-एंटीबॉडी (जैसे ANA या RF) की जाँच।
  • अल्ट्रासाउंड, CT या PET स्कैन — ग्रंथियों का आकार और बनावट दिखाते हैं, उन गहरी ग्रंथियों का भी जो महसूस नहीं होतीं।
  • सुई की जाँच (FNAC) या बायोप्सी — कुछ कोशिकाएँ या पूरी ग्रंथि निकालकर माइक्रोस्कोप से जाँची जाती है।
  • लिम्फ़ोसिंटिग्राफ़ी — एक स्कैन, जो लिम्फ़ नलियों में एक बहुत छोटे, हानिरहित ट्रेसर को देखता है, ताकि पता चले कि निकासी कहाँ रुकी है।

लिम्फ़ और रोग-प्रतिरोधक तंत्र की बीमारियों का इलाज कैसे होता है?

  • इन्फ़ेक्शन का इलाज — कीटाणु के हिसाब से डॉक्टर द्वारा चुनी गई एंटीबायोटिक, एंटीवायरल या एंटीफ़ंगल दवाएँ।
  • टीके — रोग-प्रतिरोधक तंत्र को किसी कीटाणु से मिलने से पहले ही उसे पहचानना सिखाते हैं।
  • ज़्यादा भड़की रक्षा को शांत करना — एलर्जी की दवाएँ, इनहेलर, और ऑटो-इम्यून बीमारी में रोग-प्रतिरोधक तंत्र को धीमा करने वाली दवाएँ — डॉक्टर लिखते हैं और निगरानी करते हैं।
  • लिम्फ़ोडिमा की देखभाल — दबाव वाले कपड़े (कम्प्रेशन), विशेषज्ञ की हल्की लिम्फ़-ड्रेनेज मालिश, कसरत और त्वचा की सावधान देखभाल।
  • कैंसर का इलाज — लिम्फ़ोमा और ल्यूकीमिया में: कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी या बोन मैरो ट्रांसप्लांट — कैंसर-विशेषज्ञ की देखरेख में।

न्यूरोथेरेपी (LMNT)

LMNT पद्धति अपनी परिभाषा में ही लिम्फ़ को ख़ून के साथ रखती है, और रोग-प्रतिरोधक शक्ति को उन तीन स्तरों में से एक मानती है जिन पर पाचन का काम असर करता है: जब पाचन बिगड़ता है, तो जिन कीटाणुओं को आमाशय में मर जाना चाहिए था, वे आगे निकल जाते हैं, और कई जगह इन्फ़ेक्शन दिखने लगते हैं। इस थेरेपी में रोग-प्रतिरोधक शक्ति के छह पॉइंट हैं — Thymus, Thymus + Chest, Armpits, Lymph, Ton 'P' और Ton 'T' — और इन्हीं के साथ उन लोगों की सबसे लंबी सूची है जिन्हें ये नहीं देने हैं। मुख्य नियम यह है कि इन्फ़ेक्शन और ऑटो-इम्यून या सूजन वाली बीमारी को उलटे तरीक़ों से संभाला जाता है: पहले में शरीर की लड़ने की ताक़त बढ़ाई जाती है, दूसरे में कभी नहीं। यह डॉक्टरी इलाज के साथ सहारा है; इन्फ़ेक्शन में दवा की जगह कभी नहीं।

पॉइंट

  • Lymph — जाँघ के जोड़ के ठीक नीचे दोनों एड़ियाँ सटाकर, छह सेकंड नीचे और अंदर की ओर दबाकर दिया जाता है, ताकि जाँघों की लिम्फ़ ग्रंथियाँ जागें। शिक्षा का अवलोकन है कि पैर की उँगली पर फोड़ा या चोट हो, तो उसी जाँघ की ग्रंथि में बहुत दर्द होता है।
  • Armpit — बगल में बहुत-सी लिम्फ़ ग्रंथियाँ होती हैं; (12) Armpits उनकी छोटी रुकावटें खोलने के लिए सिखाया गया है — बैक्टीरिया या वायरस की बीमारी, टॉन्सिल और गले की ख़राश में, और बच्चों में कान दर्द व हल्के ज़ुकाम में।
  • Th. Only — सिर्फ़ सीने की हड्डी — हर तरफ़ तीन बार रगड़ना, बिना दबाव के, और लौटते समय कोई रगड़ नहीं। थाइमस की लिम्फ़ोसाइट के ज़रिए रोग से लड़ने की ताक़त बढ़ाने के लिए दिया जाता है।
  • Th + Ch — Thymus + Chest: जब भी यह दिया जाए, Armpits भी ज़रूर दिए जाते हैं।
  • Spl — तिल्ली के ज़रिए सफ़ेद कोशिकाएँ और एंटीबॉडी बनाने के लिए सिखाया गया है — वायरल बुख़ार, सेप्टिसीमिया और HIV में; पर डायबिटीज़ या दूसरी ऑटो-इम्यून बीमारियों, ज़ुकाम, एलर्जी या अस्थमा में नहीं।
  • Subclavian — हँसली और गर्दन के साथ अँगूठे का एक घेरा, जो गर्दन के निचले हिस्से की शिराओं के ज़रिए लिम्फ़ को जगाने के लिए दिया जाता है। यह तभी दिया जाता है जब दोनों हाथों की अनामिका (रिंग फ़िंगर) में दर्द हो।
  • (6) Adr — उलटी दिशा में काम करता है: यह रोग-प्रतिरोधक शक्ति घटाता है और सूजन का मुख्य पॉइंट है — इसलिए जहाँ ताक़त पहले से कम हो, जैसे सेप्टिसीमिया, HIV या कैंसर में, वहाँ नहीं दिया जाता।

फ़ॉर्मूले

VTF (Mild)

(1) Lymph (1) point Spl (1) Th. Only × 6 treatments — शरीर को बीमारी से बचाने के लिए सबके लिए फ़ायदेमंद बताया गया है, बुख़ार आ जाने के बाद भी, और छोटे बच्चों के लिए भी ठीक। ऑटो-इम्यून बीमारियों में नहीं दिया जाता।

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VTF, पुरानी बीमारी वाला रूप

(1) Lymph (1) Th. Only × 6 treatments — पुरानी बीमारी के लिए हल्का रूप; तिल्ली पर तभी काम होता है जब Spl पॉइंट पर दर्द हो।

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VTF (असली रूप)

पुराना, भारी वायरल ट्रीटमेंट, जिसमें Armpits और Ton 'P' थे। बाद के हर रूप में वे क़दम हटाए गए जिनके साथ सबसे ज़्यादा सावधानियाँ थीं।

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Complement System

सबसे लंबा फ़ॉर्मूला, चौदह भागों में, जो पुरानी बीमारी में UDF फ़ॉर्मूले के बाद दिया जाता है। डायबिटीज़ या किसी भी ऑटो-इम्यून बीमारी में भाग V, VI और VII — (1) Thymus, (1) Lymph और (1) Ton 'T' — छोड़ दिए जाते हैं।

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Subclavian ट्रीटमेंट

दो बार दिया जाता है। अगर अनामिका का दर्द चला जाए — और उसके साथ Folic acid, B₁₂ और Liv°–Mu° के दर्द भी — तो तकलीफ़ लिम्फ़ की थी; अगर नहीं, तो शिक्षा Raman की ओर मुड़ती है।

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ITF

सूजन का फ़ॉर्मूला, दो दिनों में। यह रोग-प्रतिरोधक शक्ति घटाता है, इसलिए वायरल ट्रीटमेंट से अलग रखा जाता है — इन्फ़ेक्शन और सूजन का इलाज उलटे तरीक़ों से होता है।

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गुरुजी कहते हैं

“हम किसी एक बीमारी का इलाज नहीं करते; हम उस दिन शरीर की हालत के अनुसार इलाज करते हैं।”
— डॉ. लाजपतराय मेहरा
“जहाँ भी सवाल का निशान है, वह इस बात का संकेत है कि यह मेरी अपनी सोच है, जिस पर अब दूसरे लोग रिसर्च कर सकते हैं।”
— डॉ. लाजपतराय मेहरा
“हमारे इलाज से रोगी को तुरंत फ़ायदा मिले या न मिले, हमारी लापरवाही से उसे कोई नुक़सान न पहुँचे — इसका ध्यान रखें।”
— डॉ. लाजपतराय मेहरा

यह कभी न करें

  • इमरजेंसी: किसी घाव से बाँह या टाँग पर ऊपर चढ़ती लाल लकीर, तेज़ी से फैलती लाली, कँपकँपी के साथ तेज़ बुख़ार, उलझन, या अचानक बहुत बीमार दिखता व्यक्ति — उसी दिन डॉक्टरी मदद लें या 108/112 पर फ़ोन करें। सेप्सिस इमरजेंसी है, और संक्रमित, गर्म या सूजी त्वचा पर कभी दबाव नहीं दिया जाता। सेप्टिसीमिया (सेप्सिस)
  • जो गिल्टी सख़्त, बिना दर्द, जमी हुई, बढ़ती हुई हो या दो-तीन हफ़्ते से ज़्यादा रहे — या कोई भी गाँठ जिसके साथ रात को पसीना, बुख़ार या वज़न घटना हो — उसे इसी हफ़्ते डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है। चटाई पर इसका 'इलाज करके देखते रहना' कभी नहीं होता। How to say it
  • रोग-प्रतिरोधक शक्ति वाले पॉइंट — Thymus, Thymus + Chest, Lymph, Armpits, Ton 'P', Ton 'T' और Spl — ऑटो-इम्यून बीमारियों, आर्थराइटिस, सूजन, पोलियो, डायबिटीज़ और किडनी की बीमारियों में रोके जाते हैं। जिस शरीर की रक्षा-व्यवस्था ख़ुद उसी पर हमला कर रही हो, वहाँ ताक़त बढ़ाना सबसे आख़िरी चीज़ है जो चाहिए। Autoimmune disorders · arthritis · inflammatory diseases · polio
  • लिम्फ़ ग्रंथियों के कैंसर, पोलियो, डायबिटीज़ या किसी भी ऑटो-इम्यून बीमारी में Armpits नहीं दिए जाते। गर्भावस्था या दिल की बीमारी में Thymus और Thymus + Chest नहीं दिए जाते। Armpit
  • (6) Adr रोग-प्रतिरोधक शक्ति घटाता है: सेप्टिसीमिया, HIV/एड्स या कैंसर में, और हाई ब्लड प्रेशर में नहीं दिया जाता। (6) Adr
  • जाँघ के जोड़ की दुखती गिल्टी का मतलब है कि उसमें कहीं से कुछ बहकर आ रहा है। थेरेपिस्ट सिर्फ़ गिल्टी दबाने के बजाय पूरी टाँग, पैर, उँगलियों के बीच और नाख़ूनों को देखकर वजह ढूँढता है। Lymph
  • कैंसर: अगर व्यक्ति को कैंसर है, तो (10) Pan, Thymus, Pit, Lu + Sh, Rt. Ov / Lt. Ov और (30) Medulla कभी नहीं दिए जाते — और किसी को भी कैंसर-टीम का इलाज टालने या रोकने की सलाह कभी नहीं दी जाती। कैंसर देखभाल: न्यूरोथेरेपी (LMNT) का सहारा
  • इन्फ़ेक्शन में वही दवा चाहिए जो डॉक्टर लिखें। उसे लेते रहें, और रोग-प्रतिरोधक तंत्र को दबाने वाली दवा अपने-आप कभी बंद न करें। न्यूरोथेरेपी (LMNT) आपके इलाज के साथ काम करती है, उसकी जगह कभी नहीं।

देखभाल

मैं अपनी लिम्फ़ को चलता हुआ और अपनी रक्षा-व्यवस्था को मज़बूत कैसे रखूँ?

लिम्फ़ का अपना कोई पंप नहीं है, इसलिए रोज़ की आदतें ही पंप का काम करती हैं। इनमें से ज़्यादातर आदतें रोग-प्रतिरोधक तंत्र की भी मदद करती हैं।

चलते-फिरते रहें

रोज़ चलें और लंबे समय तक बैठे रहने को बीच-बीच में तोड़ें: पिंडली का हर खिंचाव लिम्फ़ को ऊपर धकेलता है। लंबे सफ़र में टखने ऊपर-नीचे करें और जब हो सके खड़े हो जाएँ। WHO वयस्कों को हफ़्ते में कम से कम 150 मिनट मध्यम गतिविधि की सलाह देता है।

गहरी साँस लें

धीमी, पेट से ली गई साँस डायाफ़्राम को ऊपर-नीचे चलाती है, जो छाती में लिम्फ़ को ऊपर धकेलने में मदद करता है।

पाचन का ध्यान रखें

LMNT पद्धति में कमज़ोर पाचन कीटाणुओं को आगे जाने देता है और लड़ने की ताक़त घटाता है। समय पर खाएँ, अच्छी तरह चबाएँ, और कब्ज़ व मल में बिना पचे खाने को गंभीरता से लें।

पूरी नींद लें

ज़्यादातर वयस्कों को 7 से 9 घंटे की नींद चाहिए। कम नींद को आसानी से इन्फ़ेक्शन पकड़ने से जोड़ा गया है।

अपनी त्वचा की रक्षा करें

कट को तुरंत साफ़ करें और पैरों पर नज़र रखें, ख़ासकर डायबिटीज़ में। छोटा-सा घाव ही आम तौर पर सूजी गिल्टी का दरवाज़ा बनता है।

सलाह दिए गए टीके लगवाएँ

टीके आपकी रक्षा-व्यवस्था को पहले से तैयार करते हैं। अपने डॉक्टर से पूछें कि आपकी उम्र में कौन-से टीके बाक़ी हैं।

तंबाकू से दूर रहें

धूम्रपान साँस की नलियों की रक्षा कमज़ोर करता है और घाव भरने को धीमा करता है।

आम सवाल

'गिल्टियाँ सूजना' क्या होता है?

ये काम करती हुई लिम्फ़ ग्रंथियाँ हैं। जब कीटाणु आते हैं — जैसे गले की ख़राश से — तो सबसे पास की ग्रंथियों में रक्षक कोशिकाएँ बढ़ जाती हैं, ग्रंथि फूल जाती है और दुख सकती है। इन्फ़ेक्शन ठीक होते ही यह आम तौर पर लगभग दो हफ़्ते में बैठ जाती है। अगर ज़्यादा दिन रहे, बढ़ती जाए, सख़्त या जमी हुई लगे, या बुख़ार, रात के पसीने या वज़न घटने के साथ हो, तो डॉक्टर को दिखाएँ।

क्या लिम्फ़ और ख़ून एक ही हैं?

नहीं। लिम्फ़ ख़ून के उस पानी वाले हिस्से से बनती है जो ऊतकों में रिस जाता है। यह साफ़ या हल्की पीली होती है, इसमें सफ़ेद कोशिकाएँ, प्रोटीन और चर्बी होती है, पर लाल कोशिकाएँ नहीं। रोज़ इसकी सिर्फ़ लगभग 2 से 3 लीटर मात्रा ख़ून में लौटती है।

क्या लिम्फ़ का भी दिल जैसा कोई पंप है?

नहीं। लिम्फ़ को काम करती मांसपेशियों का दबाव, साँस के साथ डायाफ़्राम का ऊपर-नीचे होना, पास की धमनियों की हल्की धड़कन और नलियों की दीवारों का हल्का सिकुड़ना आगे बढ़ाता है; एक-तरफ़ा वाल्व उसे पीछे नहीं जाने देते। इसीलिए लंबे समय तक बैठना, बिस्तर पर पड़े रहना और तंग कपड़े इसे धीमा कर देते हैं।

मैं अपनी रोग-प्रतिरोधक शक्ति कैसे बढ़ाऊँ?

कोई एक गोली नहीं है। अच्छी नींद, अच्छा पाचन, नियमित गतिविधि, धूम्रपान न करना और सलाह दिए गए टीके — सब मदद करते हैं। और 'ज़्यादा' हमेशा बेहतर नहीं होता: एलर्जी और ऑटो-इम्यून बीमारी में रक्षा-व्यवस्था पहले ही ज़रूरत से ज़्यादा सक्रिय होती है। LMNT पद्धति ख़ुद ऐसे रोगियों को रोग-प्रतिरोधक शक्ति वाले पॉइंट कभी नहीं देती।

क्या न्यूरोथेरेपी (LMNT) वायरस या बैक्टीरिया को मार सकती है?

नहीं — और यह ऐसा दावा भी नहीं करती। LMNT पद्धति कीटाणु को नहीं, शरीर की अपनी लड़ने की ताक़त को देखती है और उसी ताक़त को सहारा देने का लक्ष्य रखती है। इन्फ़ेक्शन में फिर भी वही दवा चाहिए जो आपके डॉक्टर लिखें; न्यूरोथेरेपी (LMNT) उसके साथ दी जाती है।

डायबिटीज़ या किडनी की बीमारी में रोग-प्रतिरोधक शक्ति वाले पॉइंट क्यों नहीं दिए जाते?

LMNT पद्धति डायबिटीज़ को ऑटो-इम्यून बीमारियों के साथ रखती है, और कहती है कि किडनी की लगभग सारी बीमारियाँ भी ऑटो-इम्यून होती हैं। इनमें शरीर की रक्षा-व्यवस्था पहले से ही अपने ख़िलाफ़ मुड़ी होती है, इसलिए रोग-प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाले पॉइंट रोके जाते हैं और उनकी जगह दूसरा काम चुना जाता है।

मुझे अपने डॉक्टर या थेरेपिस्ट से क्या पूछना चाहिए?

  • क्या यह सूजी गिल्टी पास के किसी इन्फ़ेक्शन से है, और दोबारा जाँच से पहले मुझे कितना इंतज़ार करना चाहिए?
  • बार-बार होने वाले इन्फ़ेक्शन के लिए क्या मुझे ब्लड काउंट या कोई दूसरी जाँच करानी चाहिए?
  • क्या मेरी हालत ऐसी है जिसमें रोग-प्रतिरोधक तंत्र बहुत कमज़ोर है, या बहुत सक्रिय?
  • मेरे लिए कौन-से टीके बाक़ी हैं?
  • किन संकेतों पर मुझे उसी दिन वापस आना चाहिए?
  • (थेरेपिस्ट से) मेरे लिए रोग-प्रतिरोधक शक्ति वाले कौन-से पॉइंट रोके गए हैं, और क्यों?

हैरान करने वाली बातें

1आपकी दूसरी नदी का कोई पंप नहीं है

ख़ून के पास दिल है। लिम्फ़ के पास अपना कुछ नहीं: यह इसलिए चलती है कि मांसपेशियाँ इसकी नलियों को दबाती हैं, डायाफ़्राम ऊपर-नीचे होता है, और एक-तरफ़ा वाल्व इसे पीछे फिसलने नहीं देते। पिंडली की मांसपेशी यह काम इतना करती है कि उसे अक्सर 'दूसरा दिल' कहा जाता है। बहुत देर तक बिल्कुल स्थिर खड़े रहें — जैसे कभी-कभी परेड में सिपाही — तो लोग बेहोश तक हो सकते हैं।

पिंडली का पंप: हर क़दम मांसपेशी के अंदर की नलियों को दबाता है, और वाल्व लिम्फ़ को सिर्फ़ एक ही दिशा में जाने देते हैं — ऊपर।

स्रोत: Guyton & Hall, Medical Physiology — the lymphatic pump (muscle contraction, respiration, valves); calf muscle pump in venous and lymph return; LMNT source 3.3 and 37.29.

2रोज़ सिर्फ़ 2 से 3 लीटर

आपका दिल रोज़ हज़ारों लीटर ख़ून आगे बढ़ाता है। उसी दिन में सिर्फ़ लगभग 2 से 3 लीटर लिम्फ़ वापस ख़ून में बहती है। यह धीमी इसलिए है कि यह भारी सामान ढोती है — भारी प्रोटीन, चर्बी और शरीर की रक्षक कोशिकाएँ।

स्रोत: Guyton & Hall, Medical Physiology — total lymph flow about 120 mL/hour, 2–3 L/day; LMNT source 37.29.

3आपकी तीन-चौथाई लिम्फ़ बाईं ओर से घर लौटती है

थोरैसिक डक्ट दोनों टाँगों, पूरे पेट और शरीर के बाएँ ऊपरी हिस्से की लिम्फ़ गर्दन के बाईं ओर की शिराओं में डालती है। दाईं लिम्फ़ैटिक डक्ट सिर्फ़ दाईं बाँह और सिर व छाती के दाएँ हिस्से की लिम्फ़ लाती है। LMNT पद्धति इस असमानता को दर्ज करती है और इसकी वजह को एक खुला सवाल मानती है।

स्रोत: Gray's Anatomy — thoracic duct and right lymphatic duct drainage territories; LMNT source 26.12-4.

4चर्बी वाले खाने के बाद आपकी लिम्फ़ दूधिया हो जाती है

खाने की ज़्यादातर चर्बी सीधे ख़ून में नहीं जाती। वह बहुत छोटी बूँदों में बँधकर आँत की लिम्फ़ नलियों में जाती है। भारी खाने के बाद यह लिम्फ़ दूध जैसी दिखती है, और इसे काइल (chyle) कहते हैं।

स्रोत: Guyton & Hall, Medical Physiology — absorption of fats as chylomicrons into lacteals; Gray's Anatomy — chyle.

5दिमाग़ की अपनी नालियाँ 2015 में जाकर मिलीं

बहुत समय तक पढ़ाया जाता रहा कि दिमाग़ में लिम्फ़ नलियाँ होती ही नहीं। 2015 में दो शोध-टीमों ने दिखाया कि दिमाग़ की झिल्लियों में बारीक लिम्फ़ नलियाँ चलती हैं, जो तरल और रक्षक कोशिकाओं को गर्दन की लिम्फ़ ग्रंथियों तक ले जाती हैं। जाने-पहचाने अंग भी अब तक हैरान कर सकते हैं।

स्रोत: Louveau A et al., Nature 2015;523:337–341; Aspelund A et al., J Exp Med 2015;212:991–999.

6सूजी गिल्टी यानी काम करती ग्रंथि

जब कीटाणु किसी लिम्फ़ ग्रंथि तक पहुँचते हैं, तो उसके अंदर की रक्षक कोशिकाएँ उनसे निपटने के लिए तेज़ी से बढ़ जाती हैं। ग्रंथि भर जाती है और सूज जाती है — इसीलिए गला ख़राब होने पर जबड़े के नीचे की गिल्टियाँ बढ़ती हैं और बाद में फिर छोटी हो जाती हैं।

स्रोत: NHS, 'Swollen glands'; Cleveland Clinic, 'Swollen lymph nodes'.

7आपका एक रोग-प्रतिरोधक अंग सिकुड़ने के लिए ही बना है

थाइमस, जहाँ T कोशिकाएँ प्रशिक्षित होती हैं, बचपन में सबसे ज़्यादा सक्रिय होता है। किशोरावस्था के बाद यह धीरे-धीरे सिकुड़ता है और उसकी जगह चर्बी आ जाती है। तब तक यह ज़िंदगी भर के लिए काफ़ी T कोशिकाएँ तैयार कर चुका होता है।

स्रोत: Gray's Anatomy — thymic involution; Palmer DB, Front Immunol 2013;4:316; LMNT source 17.8-4.

आँकड़ों में आपकी लिम्फ़

0अपने पंप
~2–3 Lलिम्फ़ रोज़ ख़ून में वापस
~3/4सारी लिम्फ़ गर्दन की बाईं ओर ख़ाली होती है
Hundredsलिम्फ़ ग्रंथियाँ — अनुमान लगभग 450 से 700
~1 cmसामान्य ग्रंथि का आम तौर पर ऊपरी आकार

योग

पेट से गहरी साँस Udara śvasana (diaphragmatic breathing)

पेट से साँस: पेट ऊपर उठता है, छाती शांत रहती है, और डायाफ़्राम छाती में लिम्फ़ को ऊपर पंप करने में मदद करता है।

फ़ायदे

  • हर गहरी साँस डायाफ़्राम को चलाती है, जो छाती से गर्दन तक लिम्फ़ को ऊपर धकेलने में मदद करता है।
  • धीमी साँस तनाव की प्रतिक्रिया को शांत करती है।
  • बुज़ुर्गों और बीमारी से उबर रहे लोगों के लिए भी काफ़ी हल्की।

कैसे करें

  1. घुटने मोड़कर पीठ के बल लेटें, या कुर्सी पर सीधे बैठें।
  2. एक हाथ छाती के ऊपरी हिस्से पर और दूसरा पेट पर रखें।
  3. नाक से लगभग 4 सेकंड धीरे साँस लें, पेट को ऊपर उठने दें और छाती को लगभग स्थिर रखें।
  4. लगभग 6 सेकंड में धीरे-धीरे साँस छोड़ें और पेट को नीचे जाता महसूस करें।
  5. 5 से 10 मिनट तक करें।

ध्यान रखें

साँस पर कभी ज़ोर न डालें और न रोकें। चक्कर आए तो रुक जाएँ। अगर सीधा लेटने पर साँस फूलती है, तो बैठकर करें और साँस फूलने के बारे में डॉक्टर को बताएँ।

ताड़ासन — एड़ी उठाकर खिंचाव Tāḍāsana

ताड़ासन: ऊपर की ओर खिंचें और पंजों पर उठें — हर बार उठने पर पिंडली का पंप दबता है।

फ़ायदे

  • पंजों पर उठने से पिंडली की मांसपेशियाँ कसती हैं, जो टाँगों की लिम्फ़ और शिराओं को ऊपर दबाती हैं।
  • पूरे शरीर को खींचता है और भरपूर साँस के लिए छाती खोलता है।
  • दिन में कई बार करना आसान है, दफ़्तर में भी।

कैसे करें

  1. पैर साथ या थोड़े अलग रखकर खड़े हों, दोनों पैरों पर बराबर वज़न।
  2. उँगलियाँ आपस में फँसाएँ और बाँहें सिर के ऊपर सीधी तानें, हथेलियाँ ऊपर की ओर।
  3. साँस लेते हुए धीरे-धीरे पंजों पर उठें और ऊपर की ओर खिंचें।
  4. कुछ सेकंड रुकें, फिर साँस छोड़ते हुए एड़ियाँ और बाँहें नीचे लाएँ।
  5. 5 से 10 बार दोहराएँ।

ध्यान रखें

संतुलन डगमगाता हो तो दीवार के पास खड़े हों या कुर्सी पकड़ें। एड़ी या पिंडली में दर्द हो तो एड़ियाँ नीचे रखें। चक्कर आ रहे हों या टखने में हाल की चोट हो, तो इसे न करें।

दीवार पर टाँगें टिकाकर लेटना Viparīta Karaṇī (supported)

सहारे वाला विपरीत करणी: गुरुत्वाकर्षण थकी, फूली टाँगों से तरल निकलने में मदद करता है।

फ़ायदे

  • टाँगें ऊपर होने पर गुरुत्वाकर्षण पैरों और टखनों से लिम्फ़ और ख़ून को वापस बहने में मदद करता है।
  • दिन भर खड़े रहने या बैठने के बाद आराम देता है।
  • ताक़त नहीं चाहिए — दीवार ही सहारा देती है।

कैसे करें

  1. दीवार के बग़ल में तिरछे बैठें, पास में मुड़ा कंबल रखें।
  2. पीछे लेट जाएँ और दोनों टाँगें घुमाकर दीवार पर टिका दें; कंबल कूल्हों के नीचे सरका दें।
  3. बाँहें बग़ल में ढीली छोड़ें और धीरे साँस लें।
  4. शुरू में 3 से 5 मिनट रहें।
  5. बाहर आने के लिए घुटने मोड़ें, एक करवट लें और धीरे से उठें।

ध्यान रखें

ग्लूकोमा, बेक़ाबू हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट फ़ेलियर, गर्दन या पीठ की हाल की चोट, असुविधा हो तो माहवारी के दिनों में, या गर्भावस्था के आख़िरी महीनों में इसे न करें। अगर एक टाँग अचानक सूजी, गर्म या दर्द वाली हो जाए, तो उसे योग नहीं, डॉक्टर चाहिए।

वीडियो

Spleen Point Self Treatment | बार-बार बीमार पड़ने का सही समाधान -How to Boost Immunity & Hemoglobin?

इसमें दिखाया गया है कि Spleen (Spl) पॉइंट ख़ुद को कैसे दें — उन लोगों के लिए, जो बार-बार बीमार पड़ते हैं, ताकि रोग-प्रतिरोधक शक्ति और हीमोग्लोबिन को सहारा मिले।

LMNT पद्धति में डायबिटीज़ या दूसरी ऑटो-इम्यून बीमारियों, ज़ुकाम, एलर्जी या अस्थमा में, और आजकल कैंसर में, Spl नहीं दिया जाता।

ख़ुद को परखें

1. शरीर में लिम्फ़ को कौन आगे बढ़ाता है?

2. रोज़ लगभग कितनी लिम्फ़ ख़ून में लौटती है?

3. LMNT पद्धति में ऑटो-इम्यून बीमारियों में रोग-प्रतिरोधक शक्ति वाले पॉइंट क्यों रोके जाते हैं?

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यह पेज समझाता है कि शरीर कैसे काम करता है; यह जाँच नहीं करता। न्यूरोथेरेपी (LMNT) आपके डॉक्टरी इलाज के साथ काम करती है — डॉक्टर की दी हुई दवाएँ लेते रहें, और कोई नया या गंभीर लक्षण होने पर डॉक्टर को दिखाएँ।

Neurotherapy.Life टीम द्वारा, डॉ. लाजपतराय मेहरा की शिक्षाओं पर आधारित

समीक्षा: डॉ. दिवाकर शुक्ला, वरिष्ठ न्यूरोथेरेपिस्ट

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