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न्यूरोथेरेपी (LMNT) गाइड

जाँच से योजना तक: न्यूरोथेरेपी (LMNT) में निदान कैसे बनता है

पहली मुलाक़ात में बहुत-सी बातें सामने आती हैं। यह गाइड बताती है कि थेरेपिस्ट उन्हें एक छोटे वाक्य में कैसे बदलता है — क्या गड़बड़ है — और यह कैसे तय करता है कि पहले क्या किया जाए: पाँच क़दम, किस जाँच को पहले माना जाए, पाचन सबसे पहले क्यों, और योजना को कैसे परखा और बदला जाता है।

परिचय

पहले इलाज से ठीक पहले का पल: कार्ड तैयार है और जो पॉइंट नहीं देने हैं, वे ज़ोर से पढ़े जा रहे हैं। अभी कुछ भी दिया नहीं गया।

पहली मुलाक़ात में बहुत-सी बातें सामने आती हैं। यह गाइड बताती है कि थेरेपिस्ट उन्हें एक छोटे वाक्य में कैसे बदलता है — क्या गड़बड़ है — और यह कैसे तय करता है कि पहले क्या किया जाए: पाँच क़दम, किस जाँच को पहले माना जाए, पाचन सबसे पहले क्यों, और योजना को कैसे परखा और बदला जाता है।

चार तकलीफ़ें, एक तस्वीर

एक सिखाने वाला उदाहरण, कई रोगियों से मिलाकर बना: लगभग अट्ठावन साल की एक महिला एक सूची लेकर आईं — घुटनों में दर्द, बाल झड़ना, उठते समय चक्कर, और हाल में पता चली शुगर। एक विद्यार्थी ने हर तकलीफ़ के लिए अलग योजना बनानी शुरू कर दी — चार योजनाएँ। सीनियर थेरेपिस्ट ने एक ऐसा सवाल पूछा जो किसी सूची में नहीं था: पेट कितनी बार साफ़ होता है? जवाब था — हफ़्ते में दो बार, ज़ोर लगाकर, और छह साल से। यह उनकी किसी भी तकलीफ़ से पुराना था।

उनकी जीभ पर परत जमी थी और नाभि के आसपास कई पॉइंट दुख रहे थे। चार तकलीफ़ें असल में एक ही तस्वीर निकलीं। चारों काग़ज़ उलट दिए गए, और एक कार्ड पर कुछ पंक्तियों ने बता दिया कि गड़बड़ क्या है और उसी सुबह पहले क्या करना है। यह गाइड इसी बारे में है कि वह कार्ड कैसे लिखा जाता है।

चार शब्द, जिन्हें अलग रखना ज़रूरी है

ध्यान से इतिहास (हिस्ट्री) लेने और जाँच के बाद थेरेपिस्ट के पास एक व्यक्ति के बारे में चालीस बातें हो सकती हैं। चालीस बातें योजना नहीं होतीं। योजना है — एक वाक्य कि क्या गड़बड़ है, और एक फ़ैसला कि पहले क्या करना है। वहाँ तक पहुँचने के लिए कार्ड पर चार शब्द अलग-अलग रखे जाते हैं।

  • जाँच के नतीजे (फ़ाइंडिंग्स): जो सच में देखा गया — किसी पॉइंट का दर्द-स्तर, मल का रूप, रिपोर्ट का कोई आँकड़ा, रोगी के अपने शब्दों में कोई वाक्य।
  • निदान (डायग्नोसिस): बीमारी का नाम नहीं, बल्कि यह कि कौन-से अंग ठीक से काम नहीं कर रहे, शरीर किस दिशा में गया है (एसिड या अल्कली की ओर), और कब से।
  • योजना (प्लान): आज से, क्रम से, क्या किया जाएगा — पहला काम, कौन-से पॉइंट रोके गए हैं, परहेज़, रोगी किन दिनों आएगा, और किस चीज़ को नापा जाएगा।
  • प्रिस्क्रिप्शन: किसी सेशन में सच में दिए गए फ़ॉर्मूले, थेरेपी की अपनी संक्षिप्त लिपि (शॉर्टहैंड) में लिखे हुए।

पाँच क़दम

गुरुजी ने यह तरीक़ा तीन सीधी पंक्तियों में कहा: पेन पॉइंट (दर्द वाले बिंदु) जाँचकर पता करो कि शरीर के कौन-से हिस्से पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे; तर्क से उस कमज़ोरी की जड़ खोजो; फिर उन अंगों को सक्रिय करो ताकि वे फिर सामान्य ढंग से काम करें। मक़सद सिर्फ़ लक्षण से राहत नहीं, बल्कि शरीर की उस तरह बीमार पड़ने की आदत को हटाना है। अमल में यह पाँच क़दम बन जाता है।

  • इकट्ठा करो, और जोड़ो: नाभि के आसपास के पॉइंट का दर्द-स्तर, कूल्हे पर विटामिन B₁₂ और फ़ोलिक एसिड के पॉइंट, मल का स्वभाव, महिलाओं में माहवारी का इतिहास, पूरी हिस्ट्री और जो रिपोर्टें सच में मायने रखती हैं।
  • दिशा तय करो: पीठ पर किडनी के दो पॉइंट, Mu° और Liv°, आपस में मिलाए जाते हैं। कौन-सा दुखता है, इससे पता चलता है कि शरीर एसिड की ओर गया है या अल्कली की ओर।
  • अंगों का नाम लो, बीमारियों का नहीं: दुखते पॉइंट को उन अंगों की सीधी सूची में बदलो जो कम काम कर रहे हैं।
  • नीचे छिपी एक बात खोजो: क्या सब कुछ के पीछे कोई एक गड़बड़ है? अक्सर होती है, और अक्सर वह पाचन है। विद्यार्थी यही क़दम छोड़ देते हैं।
  • पहला काम तय करो और लिख लो: जो पॉइंट नहीं देने हैं उन्हें रोको, पहला काम चुनो, तय करो कि क्या नापा जाएगा, और रोगी को ऐसे शब्दों में समझाओ जो वह घर जाकर दोहरा सके।

कौन-सी जाँच पहले मानी जाए

अक्सर तकलीफ़ कहती है “घुटना” और जाँच करने वाला हाथ कहता है “पेट”। इसके लिए एक तय क्रम है, और यह पसंद-नापसंद की बात नहीं। रोगी की तकलीफ़ सबसे आख़िर में आती है — इसलिए नहीं कि वह मायने नहीं रखती, बल्कि इसलिए कि वह बताती है दर्द कहाँ महसूस होता है, गड़बड़ कहाँ है यह नहीं। तकलीफ़ तय करती है कि आख़िर में क्या ठीक करना है; ऊपर की बातें तय करती हैं कि पहले क्या।

  • सबसे पहले ख़तरे का संकेत (रेड फ़्लैग): जो बात डॉक्टर की है, वह कोई भी योजना बनने से पहले डॉक्टर के पास भेजी जाती है।
  • दूसरा, रोक (ब्लॉक): जो पॉइंट इस रोगी की हालत में नहीं देना है, वह योजना बनने से पहले ही हटा दिया जाता है। रोक और सलाह टकराएँ, तो रोक जीतती है।
  • तीसरा, पाचन की आग: जहाँ पाचन ठीक नहीं, वहाँ वही आगे रहता है, तकलीफ़ चाहे जो हो।
  • चौथा, दिशा: एसिड या अल्कली — यह तय करता है कि इलाज के दो उल्टे परिवारों में से कौन-सा इस्तेमाल हो सकता है।
  • पाँचवाँ, दुखने वाली तरफ़: जहाँ दोनों तरफ़ अलग बोलें, वहाँ काम दुखने वाली तरफ़ होता है।
  • छठा, चुप जाँच: जो पॉइंट नहीं दुखता, वह भी एक नतीजा है, और वह बाक़ी नतीजों का मतलब बदल देता है।
  • आख़िर में, वह तकलीफ़ जिसे लेकर रोगी आया।
कौन-सी जाँच पहले: सबसे ऊपर रेड फ़्लैग, सबसे नीचे रोगी की अपनी तकलीफ़ — क्योंकि तकलीफ़ बताती है दर्द कहाँ है, गड़बड़ कहाँ है यह नहीं।

पहले पाचन, और शुरू के दस दिन

गुरुजी ने सिखाया कि ख़राब पाचन — मुख्य रूप से प्रोटीन का, और कुछ हद तक वसा (फ़ैट) का — बीमारी की जड़ में है। हर ग्रंथि अपने रसायन पाचन से बनी चीज़ों से ही बनाती है। अगर पाचन कमज़ोर है, तो हर ग्रंथि कमज़ोर पड़ती है, और जो हिस्सा पहले से सबसे कमज़ोर था, वह सबसे पहले शिकायत करता है। इसलिए पहला इलाज पाचन को सुधारता है, और अकसर इसी से मौजूदा तकलीफ़ में भी राहत मिलती है, तकलीफ़ चाहे जो हो।

रोगी को रसोई की मिसाल से समझाया जाता है: एक रसोई सौ घरों को खाना देती है। अगर वह आधी ताक़त से चले, तो हर घर में कमी होगी, और सबसे कमज़ोर घर में सबसे पहले दिखेगी। आपका घुटना वही सबसे कमज़ोर घर है।

इसीलिए पहले ही दिन, रजिस्ट्रेशन के समय, रोगियों को बताया जाता है कि पाचन तंत्र को ठीक करने के लिए उन्हें शुरू के दस दिन लगातार, बिना नाग़ा आना होगा। चौथे दिन टूटा कोर्स छोटा कोर्स नहीं, बल्कि दूसरा ही कोर्स बन जाता है। कई रोगी पाते हैं कि इन दस दिनों के अंत तक वे तकलीफ़ें भी कम हो गईं जिनका सीधा इलाज किसी ने नहीं किया था।

ब्लॉकिंग: क्या नहीं देना है, यह पहले तय होता है

कुछ बीमारियों में कुछ ग्रंथियाँ पहले से ही ज़रूरत से ज़्यादा काम करती हैं। यह थेरेपी ग्रंथियों को सक्रिय करती है, इसलिए थेरेपिस्ट को पता होना चाहिए कि किस हालत में कौन-से पॉइंट नहीं देने हैं। पहली मुलाक़ात में, किसी भी इलाज से पहले, ये पॉइंट डायग्नोसिस कार्ड पर एक डिब्बे में घेरकर अलग कर दिए जाते हैं। इसे ब्लॉकिंग कहते हैं। रोक योजना के साथ लगी चेतावनी नहीं है; यह वह ढाँचा है जिसके अंदर योजना बनती है।

कई रोकों के साथ यह भी लिखा होता है कि रोके गए पॉइंट की जगह कौन-सा सुरक्षित पॉइंट दिया जाए, और यही बदलाव तय करते हैं कि योजना में क्या रहेगा। रोक हमेशा के लिए नहीं होती: वह तब तक चाहिए जब तक उस बीमारी के मुख्य लक्षण बने रहें। जब रोक हटाई जाती है, तो तारीख़, कारण और फ़ैसला करने वाले का नाम कार्ड पर लिखा जाता है।

सुधार कैसा दिखता है, और योजना कब बदलनी चाहिए

पहले दिन थेरेपिस्ट एक आधार-रेखा (बेसलाइन) लिखता है: भूख, नींद, ऊर्जा, कमज़ोरी और हल्केपन का एहसास — हर एक पाँच में से — और कल पिए गए पानी के गिलास। ये छोटे संकेत अक्सर सबसे पहले, एक-दो दिन में बदलते हैं। छोटी तकलीफ़ों में राहत अक्सर कुछ दिनों में आती है, और मुख्य तकलीफ़ धीरे-धीरे। हर मुलाक़ात में दुखते पॉइंट दोबारा जाँचे जाते हैं: जहाँ दर्द कम हुआ, वहाँ ख़ून की सप्लाई लौट आई।

अगर कुछ दिनों बाद भी कुछ नहीं बदला, तो थेरेपिस्ट इलाज बदलने की जल्दी नहीं करता। पहले देखता है: क्या योजना सच में निभाई गई — असल में कितने दिन आए, कल क्या खाया, कितना पानी पिया? फिर पूरी दोबारा जाँच, नए ढंग से पूछी गई हिस्ट्री, और किसी नए ख़तरे के संकेत की जाँच। उसके बाद ही एक चीज़ बदली जाती है, और तारीख़ व उम्मीद के साथ लिखी जाती है।

मुख्य बातें

  • योजना एक वाक्य है कि क्या गड़बड़ है, और एक फ़ैसला कि पहले क्या करना है — हर नतीजे की सूची नहीं।
  • निदान बीमारी का नाम नहीं, बल्कि कम काम कर रहे अंग और शरीर की दिशा बताता है।
  • कई तकलीफ़ें अक्सर एक ही समस्या के कई चेहरे होती हैं; सबसे आम जड़ पाचन है।
  • ख़तरे के संकेत पहले डॉक्टर के पास जाते हैं; रोके गए पॉइंट योजना बनने से पहले ही चिह्नित होते हैं।
  • शुरू के दस दिन, बिना नाग़ा, पाचन को ठीक करने में लगते हैं।
  • पहले दिन लिखी गई आधार-रेखा ही बाद में यह ईमानदारी से दिखाने का तरीक़ा है कि कुछ बदला या नहीं।
  • जब योजना काम न करे, तो पहले देखो कि वह निभाई गई या नहीं, फिर एक बार में एक ही चीज़ बदलो।

इस गाइड के विषय

और गहराई से जानिए

रोगी की कहानी सुनना: ऐसा इतिहास जो धोखा न दे

हिस्ट्री किस क्रम में ली जाती है

पहले नाभि बोलती है: दर्द-पॉइंट का नक्शा

नाभि के आसपास के पॉइंट, जिनसे हर जाँच शुरू होती है

दो राज्य: एसिडिक और अल्कलाइन शरीर

किडनी के दो पॉइंट शरीर की दिशा कैसे तय करते हैं

आग और राख: मल में बिना पचा खाना

पाचन पहला काम क्यों है

रिपोर्ट पढ़ना: कौन-सी जाँच इलाज बदलती है

यह तय करना कि कोई रिपोर्ट योजना बदलती है या नहीं

शॉर्टहैंड: न्यूरोथेरेपी (LMNT) के इलाज कैसे लिखे और पढ़े जाते हैं

कार्ड पर प्रिस्क्रिप्शन कैसे लिखा जाता है

सत्र नहीं, हफ़्ते: न्यूरोथेरेपी (LMNT) का कोर्स कैसे तय होता है

कोर्स हफ़्तों में कैसे चलता है, एक-एक सेशन में नहीं

न्यूरोथेरेपी (LMNT) का डायग्नोसिस कार्ड: क्या लिखा जाता है और क्यों

पूरे डायग्नोसिस कार्ड में क्या-क्या होता है

सावधानी: कब नहीं दिया जाता

  • कुछ बातें कोई भी योजना बनने से पहले डॉक्टर के पास जाती हैं: मल, पेशाब, उल्टी या खाँसी में ख़ून, चाहे एक बार ही; आराम में भी साँस फूलना; मेहनत पर छाती में जकड़न जो आराम से चली जाए; सख़्त, बहुत दुखता पेट, साथ में उल्टी या फूलना; बुख़ार के साथ गर्दन अकड़ना, या ऐसा दाना जो दबाने पर फीका न पड़े; बिना कोशिश वज़न घटना; ऐसी रिपोर्ट जिसमें नई गाँठ या बढ़ा हुआ क्रिएटिनिन लिखा हो और किसी डॉक्टर ने न देखी हो। रोगी को डॉक्टर के पास जाने को कैसे कहें
  • रोके गए पॉइंट पहले इलाज से पहले कार्ड पर चिह्नित किए जाते हैं, और रोक हमेशा सलाह पर भारी पड़ती है। जब हाथ को रुकना ही चाहिए: न्यूरोथेरेपी (LMNT) में ब्लॉक किए गए पॉइंट और सुरक्षा
  • कैंसर में (10) Pan, Thymus, Pit, Lu + Sh, Rt. Ov / Lt. Ov और (30) Medulla कभी नहीं दिए जाते। कैंसर देखभाल: न्यूरोथेरेपी (LMNT) का सहारा
  • दिल की बीमारियों में (10) Medulla कभी दोनों तरफ़ नहीं दिया जाता; सिर्फ़ (10) Left Medulla दिया जाता है। (10) Medulla
  • दिशा इलाज का परिवार तय करती है: अल्कलोसिस में एसिड सुधारने वाला फ़ॉर्मूला (ATF) कभी नहीं, एसिडोसिस में अल्कली सुधारने वाला फ़ॉर्मूला (ALTF) कभी नहीं। दो राज्यों को सुधारना: एसिड और अल्कली के फ़ॉर्मूले
  • अगर किसी पॉइंट या फ़ॉर्मूले के बाद तकलीफ़ बढ़े, तो तुरंत मुख्य थेरेपिस्ट से राय ली जाती है और यह कार्ड पर लिखा जाता है। ट्रीटमेंट के बाद उलटा असर
  • न्यूरोथेरेपी (LMNT) ले रहे हैं, इसलिए अपनी दवा कभी बंद या कम न करें; यह फ़ैसला आपके अपने डॉक्टर का है।

गुरुजी कहते हैं

“ठीक ऐसा ही होना चाहिए। और यही न्यूरोथेरेपी (LMNT) की सफलता का राज़ है।”
— डॉ. लाजपतराय मेहरा, इस पर कि एक ही बीमारी वाले दो लोगों को दो अलग इलाज क्यों चाहिए हो सकते हैं
“अगर आमाशय, फेफड़े और किडनी ठीक से काम करें, तो बीमारी आ ही नहीं सकती।”
— डॉ. लाजपतराय मेहरा

आम सवाल

मेरी चार अलग तकलीफ़ें हैं। थेरेपिस्ट इतना कम क्यों लिख रहे हैं?

क्योंकि उनमें से तीन शायद एक ही जगह से आ रही हैं। कार्ड पर वह लिखा जाता है जो जाँच में मिला, सिर्फ़ वह नहीं जो आपने बताया — और अगले हफ़्ते उसी से तुलना होगी। अगर अंदाज़ा ग़लत हुआ, तो अगले दस दिन साफ़ बता देंगे।

मैं घुटनों के लिए आया हूँ। आप मेरे पेट का इलाज क्यों कर रहे हैं?

क्योंकि आपके घुटने भी उसी सामग्री से ठीक होते हैं जिससे बाक़ी शरीर, और वह सामग्री पाचन से आती है। पाचन कमज़ोर हो, तो घुटने को बचा-खुचा मिलता है। घुटने को भुलाया नहीं गया; पाचन का काम यह पक्का करता है कि घुटने का काम टिके।

मुझे कब तक कुछ फ़र्क़ महसूस होगा?

भूख, नींद और ऊर्जा में अक्सर सबसे पहले, एक-दो दिन में बदलाव आता है। छोटी तकलीफ़ें अक्सर कुछ दिनों में कम होती हैं। मुख्य तकलीफ़ आम तौर पर धीरे सुधरती है, इसलिए पहले हफ़्ते को उससे नहीं नापना चाहिए।

मेरे कार्ड पर डिब्बे में लिखे पॉइंट क्या हैं?

ये वे इलाज हैं जो आपकी मौजूदा बीमारियों के कारण आपको नहीं दिए जाने चाहिए। इन्हें सबसे पहले लिखा जाता है ताकि आपका इलाज करने वाला कोई भी इन्हें भूल न सके। ये हमेशा के लिए नहीं होते; मुख्य तकलीफ़ ठीक होने पर कुछ फिर दिए जा सकते हैं, और यह फ़ैसला तारीख़ के साथ लिखा जाता है।

मेरी सारी रिपोर्टें नॉर्मल हैं। क्या मुझे सच में कुछ है?

नॉर्मल रिपोर्ट अच्छी ख़बर है: जिन चीज़ों को वे जाँचें ढूँढती हैं, वे नहीं मिलीं। पर वे यह दिखाने के लिए नहीं बनीं कि कोई अंग कितनी फुर्ती से काम कर रहा है। यह जाँच से, और आपकी भूख, नींद और पेट साफ़ होने से पता चलता है। इसमें आपकी रिपोर्टों से कोई टकराव नहीं है।

ख़ुद को परखें

1. इस थेरेपी में निदान किसका नाम लेता है?

2. किस जाँच को सबसे पहले माना जाता है?

3. पहले दस दिन बाद योजना काम नहीं कर रही। सबसे पहले क्या जाँचा जाता है?

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यह पेज बताता है कि न्यूरोथेरेपी (LMNT) का यह ट्रीटमेंट किसलिए है; यह ख़ुद इलाज करने की गाइड नहीं है और जाँच नहीं करता। न्यूरोथेरेपी (LMNT) आपके डॉक्टरी इलाज के साथ काम करती है — डॉक्टर की दी हुई दवाएँ लेते रहें।

Neurotherapy.Life टीम द्वारा, डॉ. लाजपतराय मेहरा की शिक्षाओं पर आधारित

समीक्षा: डॉ. दिवाकर शुक्ला, वरिष्ठ न्यूरोथेरेपिस्ट

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