दो सेशन के बीच: रोगी के रोज़ के नियम
इलाज लगभग आधे घंटे का होता है; बाक़ी पूरा दिन रोगी का अपना है। इलाज के समय, नींद, उठने और नहाने के ये आसान नियम शरीर को वह सुधार सँभाले रखने में मदद करते हैं जो हर सेशन में होता है।
परिचय
इलाज लगभग आधे घंटे का होता है; बाक़ी पूरा दिन रोगी का अपना है। इलाज के समय, नींद, उठने और नहाने के ये आसान नियम शरीर को वह सुधार सँभाले रखने में मदद करते हैं जो हर सेशन में होता है।
आधा घंटा इलाज, पूरा दिन घर पर
थेरेपिस्ट के पास रोगी लगभग आधा घंटा रहता है। बाक़ी साढ़े तेईस घंटे रोगी के अपने हैं। इलाज में जो सुधरता है, वह इन्हीं घंटों को सौंप दिया जाता है — ये घंटे उसे सँभाल भी सकते हैं और सुबह तक बिगाड़ भी सकते हैं।
एक शिक्षण-उदाहरण से यह साफ़ होता है। गर्दन के दर्द वाले एक शिक्षक को कुछ दिन आराम मिला, फिर सुधार रुक गया: हर सुबह उनकी उँगलियाँ सुन्न रहतीं और छाती में दर्द होता। इलाज सही था। कारण यह था कि वे ज़िंदगी भर दोनों हाथ सिर के नीचे रखकर सोते आए थे। जब उन्होंने बाँहें नीचे रखनी शुरू कीं, तो तीसरी सुबह तक उँगलियाँ गरम थीं और इलाज टिकने लगा।
इसलिए जब कोई इलाज बहुतों को फ़ायदा दे पर किसी एक को नहीं, तो पहला क़दम इलाज बदलना नहीं है। पहला क़दम है रोगी के दिन और रात के बारे में पूछना।
इलाज के दौरान: तुरंत बोलिए, और मदद मत कीजिए
आम तौर पर दबाव से दर्द नहीं होना चाहिए। अगर हो, तो थेरेपिस्ट को तुरंत बताइए। कोण या पैर रखने का ढंग बदल दिया जाएगा, और असर कम नहीं होगा। चुपचाप सहा गया दर्द इलाज के बाद भी रह सकता है, या कमज़ोरी छोड़ सकता है।
कुछ रोगियों को लगता है कि आज थेरेपिस्ट 'कम वज़न' दे रहा है। असली बात वज़न नहीं है। दबाव ख़ून को उन ग्रंथियों की ओर ले जाता है जहाँ वह पहले नहीं पहुँच रहा था। अगर जगह सही है, तो हल्के वज़न का थेरेपिस्ट भी उतना ही अच्छा इलाज देता है।
- जब जाँघ या पैर के नीचे तकिया रखा जाए, तो मदद के लिए कमर या पैर मत उठाइए — थेरेपिस्ट को चोट लग सकती है। ढीले पड़े रहिए, उठाने का काम थेरेपिस्ट का है।
- माथा मत उठाइए, और ज़रूरत न हो तो सिर के नीचे तकिया मत लीजिए।
- दबाव के दौरान बात मत कीजिए। नाक से लंबी, आराम की साँस लीजिए और ध्यान नाभि के आसपास रखिए। सवाल इलाजों के बीच के अंतराल में पूछिए।
लेटना और उठना: हमेशा करवट से
करवट लेना रोगी की पूरी दिनचर्या में सबसे ज़्यादा दोहराया जाने वाला नियम है, और यह पूरे दिन लागू होता है, सिर्फ़ क्लिनिक में नहीं। लेटने के लिए: बिस्तर पर बैठिए, पैर साथ लाकर घुटने मोड़िए, हाथों के सहारे किसी भी करवट लेटिए, फिर पैर सीधे कीजिए। उठने के लिए: पहले करवट लीजिए, पैर मोड़िए, फिर हाथों के सहारे उठिए।
कारण यह बताया गया है कि बिस्तर से सीधे उठने पर नाभि पर अचानक ज़ोर पड़ता है और दिल को ज़्यादा ख़ून की ज़रूरत पड़ती है। सालों में इसे अपच, दमा, डायबिटीज़, सर्वाइकल स्पॉन्डिलोसिस (गर्दन की हड्डियों का घिसना) या दिल की तकलीफ़ का एक कारण बताया गया है। पहले करवट लेने से यह काम बाँहें कर लेती हैं।
जागने के बाद खड़े होने से पहले कम से कम आधा मिनट बिस्तर के किनारे बैठिए। कान के पीछे तरल से भरी तीन छोटी नलियाँ (सेमी-सर्कुलर कैनाल) होती हैं जो संतुलन बनाए रखती हैं; झटके से उठने पर चक्कर आ सकता है। फिर पैर ठंडे फ़र्श पर नहीं, चप्पलों पर रखिए।
नींद: जल्दी, अँधेरे में, ताज़ी हवा में — और बाँहें नीचे
नींद के नियम अपने कारणों के साथ दिए गए हैं। रात 10.30 से पहले लेट जाइए: कहा जाता है कि पीनियल ग्रंथि आधी रात के बाद लगभग साढ़े बारह बजे अपना काम करती है, और आम आदमी को गहरी नींद तक पहुँचने में लगभग दो घंटे लगते हैं। कमरे में पूरा अँधेरा रखिए — नाइट लैंप भी न हो तो अच्छा। शरीर ढीला और मन शांत रखकर लेटिए।
खिड़की खुली रखकर सोइए। बंद कमरे में हमारी छोड़ी हुई कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है, और शरीर पूरे दिन थका रहता है। यह नियम हवा के बारे में है, ठंड के बारे में नहीं: सर्दी में खिड़की का ऊपर से एक हाथ भर खुला हिस्सा, रोशनदान या थोड़ा खुला दरवाज़ा काफ़ी है।
हाथ सिर के नीचे या ऊपर रखकर, या बाँह आँखों पर रखकर मत सोइए। बाँह तक जाने वाली बड़ी रक्त-नलियाँ हँसली (कॉलरबोन) के नीचे से निकलती हैं; घंटों बाँहें ऊपर रहें तो हँसली उन पर दबाव डालती है। इससे छाती में दर्द या उँगलियों में सुन्नपन हो सकता है। रोशनी परेशान करे तो आँखों पर कपड़ा रख लीजिए।
सोते समय एक आसान साँस की आदत सिखाई जाती है: बाईं करवट कुछ साँसें, सीधे लेटकर उससे ज़्यादा, और दाईं करवट उससे भी ज़्यादा। इसे हाई ब्लड प्रेशर की संभावना घटाने और नींद न आने वालों की मदद के लिए दिया जाता है। लंबी, धीमी साँस से नींद आती है; छोटी, जल्दी साँस से नहीं।
नहाना: पहले तेल, पहले सिर, साबुन नहीं
नहाने से पहले सरसों के तेल (या किसी भी तेल) की एक बूँद कानों के पीछे, नाक में, नाभि पर, गुदा पर और बगलों में डाली जाती है — ये शरीर के द्वार और सिलवटें हैं। फिर पूरे शरीर पर तेल लगाइए, और बिना साबुन, सादे पानी से नहाइए। पसीने में अपने कीटाणु-नाशक तत्व होते हैं, जिन्हें साबुन नष्ट कर देता है। यह नियम सिर्फ़ नहाने का है: खाने से पहले और शौच के बाद हाथ हमेशा साबुन से धोए जाते हैं।
जहाँ तक हो सके, हर मौसम में ठंडे पानी से नहाइए; ऐसा करने वालों को सर्दी-ज़ुकाम कम होता देखा गया है। पहला लोटा सिर पर डालिए, कानों को बचाकर, फिर पीठ और कंधों पर, फिर पूरे शरीर पर। पहले कंधों पर पानी पड़े तो साँस खिंचती है, और पानी कान में जाकर मैल को फुला सकता है और सुनाई कम कर सकता है। घुटनों पर पहले पानी मत डालिए।
ठंडे पानी से नहाने के बाद नाश्ते से पहले कम से कम पैंतालीस मिनट रुकिए। शरीर को गरम होने में इतना समय लगता है, और तब तक ख़ून पेट के बजाय त्वचा के पास रहता है। उस बीच खाया खाना गैस बनाता है। और खाने के तुरंत बाद मत नहाइए।
- बच्चे या छोटे शिशु की नाक में तेल की बूँद नहीं — तेल की बूँद साँस के साथ फेफड़ों में जा सकती है।
- कानों में तेल की बूँदें मत डालिए; रुई से हल्का तेल लगाया जा सकता है। कान का मैल मत निकालिए — जितना निकालेंगे, शरीर उतना ही और बनाएगा।
हर नियम के साथ उसका कारण क्यों
हर नियम उसके कारण के साथ दिया जाता है, क्योंकि बड़े लोग अजनबी के हुक्म हफ़्तों तक नहीं मानते। कुछ कारण शरीर की किसी बनावट का नाम लेते हैं, जैसे हँसली के नीचे की नली या कान के पीछे की नलियाँ। कुछ पर ईमानदारी से 'तजुर्बे की बात' लिखा है — देखा गया, समझाया नहीं गया। यह पहचान बनाए रखना भी सिखाई का हिस्सा है।
यह सिखाई हर महीने बाल रंगने वालों से यह भी सोचने को कहती है कि इससे किडनी पर कितना अतिरिक्त काम पड़ता है, क्योंकि कहा गया है कि रंग कई दिनों तक पेशाब में निकलता रहता है। इसे सोचने की बात के रूप में रखा गया है, और फ़ैसला रोगी का ही रहता है।
मुख्य बातें
- ठीक होने का ज़्यादातर समय घर पर बीतता है; रोज़ की आदतें हर सेशन के काम को सँभाल भी सकती हैं और बिगाड़ भी।
- दबाव से दर्द हो तो तुरंत बताइए; तकिया रखते समय शरीर उठाकर मदद मत कीजिए।
- हमेशा करवट लेकर लेटिए और उठिए, फिर खड़े होने से पहले थोड़ा बैठिए।
- जल्दी सोइए, अँधेरे और हवादार कमरे में, बाँहें बगल में नीचे रखकर।
- नहाने से पहले तेल, बिना साबुन सादा पानी, पहला लोटा कानों को बचाकर सिर पर।
- ठंडे पानी से नहाने और नाश्ते के बीच कम से कम पैंतालीस मिनट रखिए।
- जब इलाज अटक जाए, तो इलाज बदलने से पहले रोगी के दिन और रात के बारे में पूछिए।
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सावधानी: कब नहीं दिया जाता
- दबाव से दर्द हो, तो तुरंत बताइए। चुपचाप सहा गया दर्द इलाज के बाद भी रह सकता है या कमज़ोरी छोड़ सकता है।
- ठंडे पानी से नहाना सबके लिए नहीं है: बेक़ाबू ब्लड प्रेशर, अस्थिर छाती के दर्द या हाल की दिल की तकलीफ़ वाले लोग, और बहुत बुज़ुर्ग या कमज़ोर लोग, स्थिर होने तक इसे छोड़ दें। हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप)
- जिसे पैरों में ठीक से महसूस नहीं होता, वह नहाने का पानी कोहनी से जाँचे, सुन्न पैर से कभी नहीं। टाँगों में सुन्नपन
- शिशु या छोटे बच्चे की नाक में कभी तेल मत डालिए। बच्चे, बुज़ुर्ग और कमज़ोर शरीर: नाज़ुक शरीर के लिए न्यूरोथेरेपी (LMNT)
- रात में छाती का दर्द या उँगलियों का सुन्न होना दूसरे कारणों से भी हो सकता है; बना रहे तो इलाज जारी रखते हुए डॉक्टर को दिखाइए। रोगी को डॉक्टर के पास जाने को कैसे कहें
- इन नियमों का पालन करते हुए डॉक्टर की दी हुई दवा कभी बंद या कम मत कीजिए।
गुरुजी कहते हैं
“यह तजुर्बे की बात है।”
आम सवाल
आप दिसंबर में खिड़की खोलने को कहते हैं। सर्दी नहीं लग जाएगी?
यह नियम हवा का है, ठंड का नहीं। बंद कमरे में हवा आपकी छोड़ी हुई गैस से भर जाती है, और आप थके हुए उठते हैं। खिड़की कितनी खुले, यह आप तय करें — ऊपर से एक हाथ भर, रोशनदान, या थोड़ा खुला दरवाज़ा काफ़ी है।
मैं बचपन से हाथ सिर के नीचे रखकर सोता हूँ। यह ग़लत कैसे है?
दो मिनट के लिए कुछ नहीं होता। रात के सात घंटे हँसली उस नली को दबाती है जो बाँह तक ख़ून ले जाती है, और उँगलियाँ सुन्न हो सकती हैं। दो रात बाँहें नीचे रखकर देखिए कि उँगलियाँ कैसी रहती हैं।
बिना साबुन के बदबू नहीं आएगी?
शरीर पर पहले तेल लगता है, इसलिए त्वचा पानी में रूखी नहीं जाती, और पसीने में अपने कीटाणु-नाशक तत्व होते हैं जिन्हें साबुन हटा देता है। और हाथ तो हमेशा साबुन से ही धुलते हैं।
10.30 से पहले सोना क्यों ज़रूरी है?
असल में नियम यह है कि आधी रात के बाद लगभग साढ़े बारह बजे तक आप गहरी नींद में हों, जब पीनियल ग्रंथि के काम करने की बात कही जाती है। गहरी नींद तक पहुँचने में लगभग दो घंटे लगते हैं, इसलिए सोने का समय उसी से पीछे गिनकर तय होता है।
ख़ुद को परखें
शोध
- उभरता प्रमाण
चूहों में नींद ने दिमाग़ी कोशिकाओं के बीच की जगह बढ़ाई और बीटा-एमिलॉइड जैसे कचरे की सफ़ाई तेज़ की — यह इशारा कि अच्छी, गहरी नींद दिमाग़ की सेहत के लिए क्यों ज़रूरी है।
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यह पेज बताता है कि न्यूरोथेरेपी (LMNT) का यह ट्रीटमेंट किसलिए है; यह ख़ुद इलाज करने की गाइड नहीं है और जाँच नहीं करता। न्यूरोथेरेपी (LMNT) आपके डॉक्टरी इलाज के साथ काम करती है — डॉक्टर की दी हुई दवाएँ लेते रहें।